सोशल मीडिया पर इन दिनों पाकिस्तान के कराची में स्थित मंगोपिर मजार की तस्वीरें और वीडियो खूब वायरल हो रहे हैं. इस मजार में एक झील है, जिसमें 200 से ज्यादा मगरमच्छ रहते हैं.
सौ साल बूढ़े मगरमच्छ भी पाए जाते हैं इस झील में (इमेज- सोशल मीडिया)
ये मगरमच्छ इतने शांत हैं कि श्रद्धालु इन्हें हाथ से खाना खिलाते हैं. ये मगरमच्छ मिठाइयां, मीट, अंडे और चावल खाते हैं. कई मगरमच्छ 100 साल से ज्यादा पुराने बताए जाते हैं. लोग इन्हें ‘बाबा फरीद के जुओं’ से जोड़कर देखते हैं. क्या है इस अनोखी जगह की पूरी कहानी?
संत से जुड़ी है कहानी
मंगोपिर मजार 13वीं सदी के सूफी संत पीर मंगो (जिन्हें साकी सुल्तान भी कहा जाता है) की दरगाह है. ये कराची के गडाप टाउन में स्थित है, जो शहर के सबसे पुराने इलाकों में से एक है. पीर मंगो बाबा फरीद गंज शकर (1173-1266) के शिष्य थे. बाबा फरीद चिश्ती सिलसिले के महान संत थे. कहानी के मुताबिक, पीर मंगो पहले हिंदू डाकू मंगो वासा थे, जो कारवां लूटते थे. एक बार उन्होंने बाबा फरीद को लूटने की कोशिश की, लेकिन बाबा की दिव्यता से प्रभावित होकर उन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया और सूफी बन गए. बाबा फरीद ने उन्हें यहां भेजा और इलाके में सूफीवाद फैलाने को
कहते हैं कि ये मगरमच्छ प्राचीन बाढ़ से यहां आए और सदियों से हैं. झील में मार्श क्रोकोडाइल्स (Crocodylus palustris) हैं, जो पाकिस्तान में बाहर विलुप्ति के कगार पर हैं, लेकिन यहां सुरक्षित हैं. श्रद्धालु इन्हें ‘मुबारक’ मानते हैं. लोग दूर-दूर से आते हैं, फतेहा पढ़ते हैं और मगरमच्छों को खाना चढ़ाते हैं. मान्यता है कि अगर मगरमच्छ खाना स्वीकार कर ले, तो मनोकामना पूरी होती है.
बेहद महत्वपूर्ण है जगह
यहां गर्म सल्फर स्प्रिंग्स भी हैं, जिन्हें त्वचा रोगों के इलाज के लिए चमत्कारी माना जाता है. लोग इनमें नहाते हैं. मजार पर शीदी मेला भी लगता है, जहां अफ्रीकी मूल के लोग धम्मल नाचते हैं. ये जगह सूफी संस्कृति और चमत्कारों का मिलन है. केयरटेकर खलीफा सज्जाद जैसे लोग बताते हैं कि मगरमच्छ कभी हमला नहीं करते, क्योंकि ये पवित्र हैं. वैज्ञानिक नजरिए से, ये मगरमच्छ सदियों से यहां हैं, क्योंकि इलाका गर्म और पानी उपलब्ध है. लेकिन लोककथाएं ज्यादा लोकप्रिय हैं.
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