रांची में अंजुमन इस्लामिया सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि पूरी कौम की सामाजिक, शैक्षिक और सामुदायिक आवाज़ है। लगभग 1500 से 2000 वोटर्स इस संस्था के सदर, नायब सदर, महासचिव, संयुक्त सचिव और 12 आमला का चुनाव करते हैं। लेकिन जैसे ही चुनाव नज़दीक आता है, शहर के माहौल में एक ही सवाल बार-बार उछाला जाने लगता है—क्या वोट बिरादरी के आधार पर पड़ता है?
यह सच है कि रांची शहर और गाँव में अंसारी समुदाय की आबादी बड़ी है। इसके साथ ही कई अन्य पंचायतें और बिरादरियाँ भी सक्रिय हैं—जैसे पठान तंज़ीम, इराकी पंचायत, कुरैशी पंचायत, मलिक पंचायत, सैय्यद पंचायत, रैन पंचायत, इदरीसी पंचायत, गद्दी पंचायत, हवारी पंचायत, चुड़िहारा पंचायत, हलालखोर पंचायत वगैरह। लेकिन जैसे ही चुनावी प्रक्रिया शुरू होती है, माहौल में यह बात तैरने लगती है कि अंसारी समुदाय बिरादरीयत के नाम पर सबसे अधिक “पोलराइज़” रहता है और समाज की एकजुटता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। सवाल यह है कि क्या यह आरोप पूरी तरह सच है, या यह केवल एक सुनियोजित “टारगेट पॉलिटिक्स” का हिस्सा है?
कई वर्षों से मैं अंजुमन इस्लामिया के चुनावी पैटर्न को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। क्या वास्तव में केवल अंसारी समुदाय ही बिरादरी के आधार पर वोट करता है? क्या वही लोग फ़र्ज़ी पंचायतें बनाकर अपने वोटर्स बढ़ाते हैं? क्या सिर्फ वही अपनी बिरादरी के नाकारा और अयोग्य लोगों को जातीय पहचान के आधार पर जिताने की कोशिश करते हैं? अगर ये सवाल वास्तविकता पर आधारित हैं और इनमें सच्चाई है, तो अंसारी समाज के संगठनों को ईमानदारी के साथ आत्ममंथन करते हुए सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। लेकिन अगर यह बात सही नहीं है, तो इस मुद्दे को बार-बार हवा देने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ तार्किक, तथ्यपूर्ण और मज़बूत सामाजिक विरोध भी होना चाहिए। साथ ही, यह भी ईमानदारी से देखना होगा कि क्या दूसरी कुछ बिरादरियाँ हमेशा निष्पक्ष, बेदाग़ और समाज को जोड़ने वाली भूमिका निभाती रही हैं, या वे भी अपने-अपने जातीय समीकरण बनाकर चुनावी रणनीति तैयार करती हैं।
ज़रा यह भी सोचिए—क्या कम संख्या वाली बिरादरियों के योग्य, पढ़े-लिखे और ईमानदार उम्मीदवारों को हम खुलकर समर्थन देते हैं? क्या अच्छे उम्मीदवार सिर्फ इसलिए पीछे नहीं रह जाते कि उनकी बिरादरी संख्या में कम है? और जो लोग दूसरों पर खुलेआम इल्ज़ाम लगाते हैं, क्या उन्होंने कभी अपने गिरेबान में झाँककर देखा कि उनके अपने गुट और पंचायतें किस तरह के जातीय समीकरण बनाती हैं? क्या उन्होंने अपने पंचो से ऐसे योग्य उम्मीदवारों को समर्थन देने की गुज़ारिश की है?
एक और अहम सवाल यह है कि क्या बिना किसी गठबंधन और गुटबाज़ी के चुनाव लड़ रहे काबिल उम्मीदवारों का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए? मेरी ऐसे सभी लोगों से बस इतनी गुज़ारिश है कि समाज को तोड़ने वाली इस गंदी राजनीति का हिस्सा न बनें। किसी एक बिरादरी को हर बार कटघरे में खड़ा कर देना न इंसाफ़ है और न ही इससे कौमी एकजुटता मज़बूत होगी।
अंजुमन का चुनाव काबिलियत, ईमानदारी, सामाजिक सेवा और नेतृत्व क्षमता के आधार पर लड़ा जाना चाहिए। वोटर्स भी ऐसे लोगों को चुनें जो सचमुच समाज को जोड़ने वाले हों, न कि तोड़ने वाले।
अल्लाह के लिए अंसारी, पठान, इराकी, कुरैशी या किसी भी बिरादरी के नाम पर समाज को मत बाँटिए। अंजुमन इस्लामिया किसी एक बिरादरी की नहीं, पूरी कौम की संस्था है। इसे मजबूत करना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
और हाँ, इन 1500–2000 वोटर्स के अलावा भी शहर के आम बाशिंदे, जो आपस में दोस्त-रिश्तेदार की तरह प्यार-मोहब्बत और एक-दूसरे के ग़म-ख़ुशी में शरीक रहते हैं, वे भी आप सबको बहुत उम्मीद और भरोसे के साथ देखते हैं। उनकी उम्मीदों को ज़िंदा रखिए, उनके भरोसे को टूटने मत दीजिए, क्योंकि यही आपसी मोहब्बत और एकजुटता सबसे बड़ी ताक़त होती है।
Post a Comment